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Thursday, 24 May 2012

मैं नारी



मैं नारी,
कभी अबला कभी सबला,
कभी शक्ति स्वरुपा, कभी बेचारी
मैं नारी,
कभी माँ ,कभी बेटी बहन ,
कभी सहचरी बन ,रिश्ते निभाती
मैं नारी,
तृण-तृण चुन घर बसाती
निराशा की गहन रातों में
दीया बन जुझती
मैं नारी,
ह्रदय में पीर ,आँखों में नीर
होठों में मुस्कान लिए
 उन्मुक्त कंठ से
मुक्ति का गाना गाती
मैं नारी,
********
महेश्वरी कनेरी


Wednesday, 16 May 2012

माँ के दूध का कर्ज़

माँ के दूध का कर्ज़

बेटा , माँ को तीर्थ के बहाने
बाहर ले गया
और दूर कहीं छोड़ आया
सुबह से शाम हुई
बेटा न आया
माँ अधीर हो उठी
बेटा-बेटा कह रोने लगी
फिर
बेहोश हो वहीं गिर पड़ी
भीड़ में से एक ने उसे उठाया
दौड़ अस्पताल पहुँचाया
रात भर इलाज करवाया
सुबह माँ की जब आँख खुली
पास एक अजनवी को पाया
माँ ने सूनी आँखों से उसे देखा
मानो मन ही मन दुआ देरही हो
फिर धीरे से उसका हाथ थामा
और बोली -बेटा तुम जो भी हो
आज तुमने अपनी माँ के दूध का कर्ज़ चुकाया है
अजनवी पैरों मैं गिर पड़ा और बोला
अभी बेटा होने का फर्ज़ बाकी है
मेरे साथ मेरे घर चलो, माँ.. 
मेरा घर खाली है
आप के आने से भर जाएगा….
**************
और इस तरह एक अजनवी बेटा बन कर बूढ़ी माँ को अपने घर ले गया, जिसे उसका अपना बेटा बोझ समझ कर बीच रास्ते में छोड़ गया था ……..
महेश्वरी कनेरी

Saturday, 12 May 2012

माँ

मैं और मेरी माँ


जब भी जीवन की कश्ती डगमगाई
माँ तुम बहुत याद आई..

शीतल पवन ने जब भी मुझे छुआ है
तेरे होने का अहसास हुआ है

बहुत कुछ दिया है ,कुछ कमी नहीं है
बस तेरी ममता की छाँव नही है

जब भी सफर में थक कर रुक जाऊँ
तेरे हाथों का सहारा मैं पाऊँ

हर पल साँसो में तुम बसती हो
दुआ बन मेरे संग चलती हो  
 
जि़क्र तेरा आया ,आँखें मेरी भर आई
माँ तुम बहुत याद आई..
*******
महेश्वरी कनेरी


Sunday, 6 May 2012

गीत मेरे तुम गाते रहना..

गीत मेरे तुम गाते रहना

मैं रहूँ या न रहूँ

गीत मेरे तुम गाते रहना

 खुशी हो चाहे गम

 यूँ ही गुनगुनाते रहना

 गीत मेरे तुम गाते रहना......

जब सब तरफ उदासी हो

तपित धरती प्यासी हो

सावन की फुहार बन

वहाँ तुम बरस जाना

गीत मेरे तुम गाते रहना.........

 जहाँ बेबसी बिलखती हो

भूख पल-पल सिसकती हो

दो वक्त की रोटी बन

 वहाँ तुम चले आना

गीत मेरे तुम गाते रहना.........

जब सब तरफ अँधेरा हो

दुखों का डेरा हो

नव प्रभात किरण बन

 वहाँ तुम छा जाना

गीत मेरे तुम गाते रहना.........

जिक्र मेरा कहीं आजाए

आँखें नम तब होजाए

हर धडकन में उनकी

यादें बन बस जाना

 गीत मेरे तुम गाते रहना.......

******************

महेश्वरी कनेरी





Saturday, 28 April 2012

दर्द

दर्द



काली रातों के गहन साये में

कितने ही दर्द सिमट कर बैठे हैं

हर दर्द फूट-फूट कर गिरता है

हर रोज़ ,धरती के आँचल में

और हर सुबह सूरज की चंचल किरणें

हँस-हँस कर पी जाती हैं

दर्द के हर उन कतरों को

फिर सब कुछ शान्त और शाश्वत सा

जैसे कुछ हुआ ही न हो.......

******

Saturday, 14 April 2012

एक आलौकिक अनुभूति

एक आलौकिक अनुभूति 

कभी मंदिर में ढ़ूँढ़ा
 कभी मस्जिद में ,
कभी चर्च में देखा ,
कभी गुरुद्वारे में
 माथा टेका
 दर-दर भटकती रही
पत्थरों को पूजती रही
मंदिरों में धंटी बजा बजा
पुकारती रही..
“कहाँ हो ? कहाँ हो प्रभु तुम ?
मुझे तुम से कुछ कहना है “
मैं रोती रही , बिलखती रही
और, पुकारती रही..
पर कोई असर नहीं..
फिर हार थक ,आँखें मूंदे
 हताश हो बैठ गई
तभी अचानक एक आवाज आई….
“कहो मुझसे क्या कहना है”
मैंने इधर –उधर देखा
वहाँ कोई न था
मैं फिर बोल उठी..
“कहाँ हो प्रभु…. कहाँ हो तुम ?
मुझे दर्शन दो… प्रभु”
फिर से आवाज आई….
“मैं यही हूँ ..तुम्हारे पास
तुम्हारी धड़कन में”
मैं समझ न पाई
मैंने अपने ह्रदय में हाथ रखा
वो धड़क रहा था
तभी मुझे एक आलौकिक अनुभूति  का
आभास होने लगा
बस उसी क्षण मैं समझ गई
प्रभु मुझ में ,मेरी धड़कन में है
और मैं दर-दर भटकती रही
ये सुखद अहसास मेरे लिए अद्भुत था
मैंने स्वयं को बहुत हलका पाया
मेरा अब सारा संशय समाप्त हो चुका था
मन स्थिर और शान्त हो गया
सच ! कितना अद्भुत था वो क्षण
और वो आलौकिक अनुभूति  ……
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महेश्वरी कनेरी


Tuesday, 10 April 2012

“प्रेम” क्या है ?



“प्रेम” जो सिर्फ ढाई अक्षर के शब्दों से मिल कर बना है । ये शब्द जितना छोटा है उतनी ही गहराई लिए हुए है ,इसके अनेक रूप है अनेक रंग हैं । ये इतना विस्तृत है कि सारा संसार इसमें समाया हुआ है। इस विषय पर कई विद्वानों ने बहुत कुछ कहा है बहुत कुछ लिखा भी है, सारा साहित्य इससे भरा पड़ा है ।फिर भी आज मैं अपनी इस पचासवीं पोस्ट के लिये इसी विषय पर कुछ लिखने का दुस्साहस कर रही हूँ । ये मेरी छोटी सी कोशिश होगी.. इसे समझने के लिए इसे जानने के लिए कि वास्तव में “प्रेम” क्या है ?.......
  
   “प्रेम” क्या है ?.......


प्रेम समर्पण है,

भावों का अर्पण है

प्रेम कोई अभिलाषा नहीं ,

सिर्फ न्योछावर है ।

प्रेम सिर्फ प्रेम के लिए है 

न कुछ माँगता है न देता है ,

वह तो अपने में ही पूर्ण

 और पर्याप्त है

प्रेम में कोई आडम्बर नहीं,

कोई आवरण नहीं

प्रेम सिर्फ आनंद और उन्माद नहीं

एक करुण दर्द भी है,

जिसे स्वेच्छा और प्रसन्नता से 

अनुभव कर सको

और उसे अपना कर

स्वयं को पूर्ण बना सको ।

प्रेम में स्वयं को इतना पिघला दो

कि वह झरना बन बह निकले

उसमें से निकता संगीत ही

निश्छल प्रेम की अमृत धारा होगी

जो स्वयं ही भीतर धीरे-धीरे प्रवाहित हो कर

सब कुछ अपने अंदर समा लेगी

तभी निर्मल प्रेम का एक सुन्दर रूप खिलेगा ।

बस…..यही प्रेम है……

हाँ यही तो प्रेम है

शाश्वत प्रेम ……